पता नहीं क्यों ऐसा लगता है जैसे सारा मनुष्य समुदाय किसी न किसी को ढूंढ रहा है। सब को कोई ना कोई चाहिए, जो उसकी बात सुन सके, समझ सके, जिससे वो दुःख साझा कर सके। दिक्कत ये नहीं है कि हम सब अकेले हैं। दिक्कत ये है कि हम सब अकेलेपन से डरते हैं। हमें अकेले जीना नहीं आता। कई बार अकेलेपन का डर इतना बढ़ जाता है कि हम दूसरों के हिसाब से भी चीज़ें करने लगते हैं ताकि बस वो हमारे साथ रहें। दूसरी दुखद चीज़ ये है कि हम दूसरों पर कई बार उम्मीदों के इतने ईंट डाल देते हैं कि हम महसूस भी नहीं करते कि वो उस बोझ को संभाल पा रहा या नहीं। गलत उम्मीदें पालना भी, उम्मीदें तोड़ देने से कहीं कम गलत नहीं है।