और फिर एक रोज़ इज़हार करते हुए मैं तुम्हें गुलाब नहीं दूंगा क्योंकि मैं नहीं चाहता हमारा प्रेम उस फूल की तरह वक़्त के साथ मुरझा जाए
मैं तुम्हें दूंगा अपनी लिखी एक कविता,
और तुम्हारा हाथ थाम कर मैं कभी ये नहीं कहूंगा कि मैं तुमपर मरता हूँ,
मैं ये कहूंगा कि मैं तुम्हारे प्रेम में जी उठता हूँ..
प्रेम में भला कोई कैसे मर सकता है, प्रेम तो चीज़ है जी उठने की ।