#Justice
मैं और मेरे अह्सास
ताउम्र दर-ब-दर भटकता रहा l
हर दरवाज़े पर में अटकता रहा ll
मुकम्मल चैन ओर सुकूं की l
तलाश में शहर बदलता रहा ll
एक दिन न्याय जरूर मिलेगा l
इसी भरोसे पर छटकता रहा ll
महफिल में हुस्न को देख l
बिन पीये ही बहकता रहा ll
इंतज़ार करते करते जाने कब l
हाथों से वक्त सरकता रहा ll
६-६-२०२४
सखी
दर्शिता बाबूभाई शाह