#Believe
मैं और मेरे अह्सास
जिन्दगी अरमानों की आँधी में फंस कर रह गई हैं l
आधी से ज्यादा जरुरतों पूरी करनने में बह गई हैं ll
कभी खुशी कभी गम यहीं है जिन्दगी की रफ़्तार l
खुशियों भरे पल मिले तो हँस कर जी लो कह गई हैं ll
वक़्त की चक्की में पिसे जा रहे हैं सारे जज़्बात l
फ़ना हो रहीं हैं ख्वाइशें की वो भी सह गई हैं ll
सरफरोश इरादे हेरा परेशान नज़र आ रहे हैं आज l
लब्जों से बंधे रिश्तों के साथ कहने को तह गई हैं ll
अच्छा लगता है बदलाव की आँधी में बहना तो l
खुद पे यकीन कर खुद बदलाव में पह गई हैं ll
२८-५-२०२४
सखी
दर्शिता बाबूभाई शाह