महीनों से अकेले रह रहा हूँ। एक गुमनाम जीवन जी रहा हूँ। यहाँ की रविवार को भी कोई अपना कहकर साथ नहीं देने वाला। जीवन उस मुकाम पर है जहाँ मेरे सभी हैं परन्तु मैं किसी का नहीं हूं। तन्हाई के बीजों को बड़ा कर रहा हूँ। जीवन अब जीवन नहीं, आँसू और संघर्ष बन कर रह गए हैं।