तेरे आने की क्या आरज़ू करूं!
यहां तो एक सोच को आते भी महिनों गुज़र जाते हैं।
कभी उन सूखे हुए रुक्को में अटक जातें हैं,
कभी खुशबूओं के शहर में गुम हो जाते हैं,
कभी टकराकर आपस में ही चूरचूर हो जाते हैं,
हम भटकते रहते हैं अपनी ही दुनिया में,
और एक तुम हो कि बाहर नहीं आते
कैसे लिखूं मैं कविता! जब शब्द ही खो जाते।
रुक्का = छोटा पत्र या चिट्ठी। पुरजा। परचा।
- मृगतृष्णा