" मोह"
मौन सीखा जाता है, अन्तर द्वंद के भावों को, देख सूरत उसकी सीरत उसकी आंखों को भा जाती!.
मां के दूध की उसकी चाहत, अब खोज रही नए अवलोकन में, सिरत उसकी आंखों में अपना पन लिए, भूल रही यादों को!.
बचपन, सुंदर मुखर ज्वलंत जीवन को, नई आशाओं में ढूंढ रहा अपने पन को पाने को!.
एक छोटा सा नन्हा मृदुल भाव लिए , देख रहा सपना भविष्य के आइने में, नहीं याद अब उसे मां के दूध की!.
बस देख रहा सपना, नए घर के आंगन में, भूल उन लम्हों की जहां जन्म हुआ उसका मां के आंचल में!.
नियति की विडंबना ऐसी, मार्ग प्रशस्त करने को बंधा डोर से, चाहत पूरी करने किसी और की!.
निश्चल, बोझिल, बस प्रेम की अनुकंपा में, भूल गया अपने अस्तित्व को, दुलारा था जिसका, अब बन गया किसी और का!.
नन्हा, दुलारा, विस्मित, बोझिल बस दे रहा, संदेश , कृत संकल्प होने में, बस नियति की डोर से बंधा, समर्पित हो, जग को अचंभित कर रहा!.
पशु, मनुष्य को सीखा रहा, प्रेम की ऐसी शिक्षा, जो अपनों को खो, नव श्रृजन दे रहा प्रकृति मानव को!.