॥ स्वयं को पहचान ॥
लड़ स्वयं से ही स्वयं का रण, स्वयं से स्वयं को ही हरा।
अपने से उन्नत स्वयं को, पायेगा तू शिखर पर खड़ा।।
टकरा जा स्वयं के अहं से, चुंकि ये समय है अहम बड़ा।
समय की चाल को बदलं दे, जो समय से ही लड़ना पड़ा।।
यूँ ही नहीं तू सबसे पृथक, तुझमें तो है क्षमता अपार।
क्षणिक बाधा से घबरा गया, रे तू पहुँच गया चन्द्रमा के पार।।
हनुमत ने भी अपने बल को, बहुत बाद में पहचाना।
जब पहचाना तो लांघ गए, प्रभु दीर्घकाय जलधामा ।।
हे मानव तू अपनी क्षमता को, तनिक भी कम न आँक,
बस उठा धनुष और चढा प्रत्यन्चा, दे भेद मीन की आँख ।।
अपने बल को पहचान हे मानव, स्वयं को तू रे पहचान।।
- ©️ जतिन त्यागी