पथिक, कहीं से मुड़ना होगा
सुबह तुम्हारी स्वच्छन्द रही,
शाम बेड़ियां रख लायी है।
तन-मन अब भी बिखरा है
फूल प्रचुर खिले हुये हैं
पथिक, राह रश्मि की चुननी होगी।
टूट गये महल सुनहरे
नभ थोड़ा सा तेरा होगा
धरती पर सुख- शयन मिलेगा।
मन के अन्दर ही अन्दर
चलने का संकल्प बँधा है,
थोड़ा प्यार से चलना होगा।
मर मिटने का दाँव खेल
पग-पग पर संघर्ष रहेगा
पथिक, जरा सा मुड़ना होगा।
* महेश रौतेला