मेरी दुआओं का कोई हक़दार तो होगा,
इस भरी महफ़िल में कोई समझदार तो होगा,
लब से क्या कहूं और कब तक,
कोई मेरी खामोशी पढ़ने को तैयार तो होगा,
इस भरी महफ़िल में,.....
चलो कोई ख़ामोशी मेरी पढ़ भी ले ये माना,
वो मेरे लफ़्ज़ों का तलबगार तो होगा,
इस भरी महफ़िल में......
तलब को अब हम अपनी सह भी लेंगे,
वो मेरी तरह वो भी क्या वफ़ादार तो होगा,
इस भरी महफ़िल में......
वफ़ा अब रास आए भी हमे ,
बस अब यही एक शक है क्या वो भी मेरा राज़दार तो होगा,
इस भरी महफ़िल में......
---अन्जू