#Ganga
गंगा की निर्मल धारा बहती अविरत l
जीवन में आगे बढ़ो सिखाती अविरत ll
तन मन समर्पित करके चलती रहती l
शंकर की जटाओं से आती अविरत ll
छितिज पर गुलाबी आभा मिलती हुई l
तेरी धाराएं रुक नहीं पाती अविरत ll
पावन गरिमामय स्वर में,अपने राग l
लहरे सदा कुछ गुनगुनाती अविरत ll
हर सुबह ममता का पसरा आँगन l
आज भी पदनख की याद दिलाती हैं ll
७-३-२०२४
सखी
दर्शिता बाबूभाई शाह