असीर हो गये जिम्मेदारी के बोझ से कब
अपने ही घर को छोड़कर दूर जाने लगे है
तरगिब बहुत देता है इसरत करने का
जिम्मेदारी इंतिखाब करके कमाने लगे है
बे हिसाब लुटाते थे पैसा इसरत पर कभी
अब अपनी कमाई के हिसाब आने लगे है
कीमत जान गये रफ़्ता रफ्ता हमनशियों की
रिश्ते नाते मुसाफत सब निभाने लगे है
पवन कुमार सैनी