वो कुछ,
शायद बोलना चाहती थी,
अपनी लिखी कहानी को,
उसको समझना चाहती थी।
लेकिन ना जाने उसने,
उससे बीन बोलो,
बीन देखे ही मुह मोड़ दिया।
इंतजार बहुत किया,
उसने उसका।
उसने भी खूब भरोसा दिया,
उसको की हम फिर मिलेंगे।
इंतजार उसका वर्षो का था,
आँखों के आँसू,
जैसे गिरना भूल चुके थे।
हाल उसके पूछती रहती,
हर उस इंशान से,
जो करीब था उसके।
बस वो कर रही थी इंतजार,
उसके लौट आने का,
एक दिन खत्म हुआ,
इंतजार उसका।
वो आया उसको मिलने भी,
लेकिन जब देखा उसको
तब आँखे उसकी बंद थी,
जब पकड़ा हाथ उसका,
तब हाथ हाथो से छुट गया था।
क्युकी "राज" वो इंतजार,
पहुंच चुका था मृत्यु सैया तक।
और कोई कितना इंतजार करे,
उसने उसका किया इंतजार,
आखरी साँस तक।
यह तो आखरी कॉल था रब का।
भरत (राज)