हमें तो आदत है बचपन से
इलाजमों को सहने की
के जो कुसूर कभी किया ही नहीं हमने
सजा उसकी भी पायी है.
ज़रा देर तो और ठहरो जाओ
ए ख्वाबों मेरी आँखों में
आज बड़ी मुद्दत के बाद नींद आयी है.
जुस्तजू जिसकी थी
उसी को पाकर खो दिया हमने
कि उनकी यादों से ही अब
रोशन मेरी तन्हाई है.
पल्लवी 🙂