लघुकथा:
गाँव में भनरा होता आया है हर साल। मेला लगा रहता है। जिसमें पशु बलि दी जाती है। फोन पर समाचार मिला कि इस साल पुलिस आ गयी मेले में पशु बलि रोकने के लिए। ग्राम सभा में दो पक्ष हो गये थे एक पशु बलि के विरोध में, दूसरा पक्ष में। पशु बलि नहीं हो पायी। जो लोग पशु बलि के पक्ष में थे उनका कहना था अब उनके परिवार के सदस्य नाचने लगे हैं। मैंने इस घटना को फोन पर अपने मित्र को बताया और कहा किसी की जान लेने से अपना भला कैसे हो सकता है! मित्र ने मेरे विचार से सहमति व्यक्त की। फिर बोले," इस साल मेरे ससुराल में वरधायी दी जाने वाली है जिसमें बाईस बकरियों की बलि दी जानी है। और वहाँ जाना है।"
* महेश रौतेला