मुठ्ठी भर सपने मेरे।
अंधेरे में थोड़े से तेल में, जलते दिए की तरह।
उसमें भी आंगन की छत खुली।
झिर झिर गिरती सपनों पर मेरे फुहार।
जैसे किसी ने ऊपर से की हो, बिन बादल बौछार।
चारों तरफ काली बदली सा अंबर।
मानो जैसे चढ़ा आ रहा तेज़ी से मेरे घर पर।
आंदोलित हो पवन आज इतराई सी दिखी मुझे।
न जाने ये कहां थी उस दिन, जब गर्मी थी लगी मुझे !
आज हृदय आकार ले रहा था न जाने कैसे ?
जैसे बालक दूध बिना,पानी बिन मछली वैसे।
एक तड़पन थी एक चुभन थी एकमात्र सपना था।
धरती अम्बर भीतर बाहर बस सपना ही अपना था।
किंतु दिए का तेल कहां तक मेरी मंशा पढ़ता?
कब तक बारिश ,तूफानों से और स्वयं से लड़ता ?
धूल धूसरित कोना कोना ,मुख पर भी थी धूल पड़ी।
कौंधी बिजली मुंह फाड़े जैसे वो मुझ पर कूद पड़ी।
टूटी खटिया पर बैठा मैं ,बैठा तो बैठा ही रहा।
मेरे सम्मुख दिए की बाती ,संग दिए का तेल बहा।
मुठ्ठी भर सपने थे मेरे संग, मैं और अकेला खड़ा वहां।
पल्ला पकड़े एक हाथ में, एक हाथ में कॉपी थी।
मैंने उस पल दूर दृष्टि से सारी सृष्टि नापी थी।
सहसा एक प्रकाश चमकता कोने से मुख पर आया।
नयन खुले तो मैंने स्वयं को स्थूल जगत में पाया।
झट देखा मैने हाथ,तो मैंने सच में मुठ्ठी बांधा था।
हां,मैने मुठ्ठी भर सपनों को और जोर से साधा था।
आनंद
लेखक /कवि
धन्यवाद।