आज के युग मे दो प्रकार के लोग होंगे।
पहले जो चले आ रहे है।
और अब जो आगे बढ़ रहे हैं।
ये पत्रकार महोदय उन लोगो से बात कर रहें हैं जो पहले से चली आ रही परंपरा के वशीभूत हैं।
उनका समाज उनके दृष्टि में ऐसा था।
तो वो समझते हैं। की महिलाओं को अंदर रहना चाहिए। बाहर की दुनिया से सरोकार ठीक नही।
तथा पहनावा उस समाज का वैसा ही था।
दूसरा इन सभी की बातो से ये झलकता है। की एक डर है।
जिस कारण से ये लोग ऐसा सोच रहे है। की काम शक्ति इसलिए जागृत होती है। क्योंकि स्त्रियां आजकल फैशन के चक्कर परंपराओं को त्याग रही हैं।
जिस कारण से लोग का मन
थोड़ा सा अपने घर को महिलाओं के प्रति सजग रहा है।
दूसरा वर्ग जो आज का है। और इससे आगे का होगा।
उसकी सोच इससे परे है।
परंतु कही न कही
आज का वर्ग भी ये स्वीकार करेगा। की स्त्री और पुरुष में दोनो में अधिकांश आकर्षण के बाल प्राप्य हैं।
जिस कारण दोनो में संबध और इत्यादि होते हैं।
अन्यथा आज का वर्ग की सोच स्त्रियों को आगे बढ़ाने की है , और। उनको स्त्रीयों के रहन सहन पहनावे आदि से कोई समस्या नहीं है।
मेरे विचार में पुराने समय में स्त्रियों को विद्वानों ने भोग माना है।
पुराने समय में तो जबकि ऐसे कपड़े नशा और रहन सहन से स्त्रियां परिचित ही नही थी।
फिर ऐसा क्यू हुआ। की राजा ने युद्ध किया और स्त्रियों पर विजय पाई। तो जैसा की लोग ने दिमाग में भरा है कूड़ा की पहनावे से होता है या लड़किया रात रात घूमती है। तो ऐसा होता है।
तो ऐसे तो लड़के भी रात रात घूमते हैं।
तो ऐसी बातों से मैं इनकार करता हू। 👍
लेकिन
तुम मेरी बात से सरोकार बिल्कुल नही करोगी।
फिर भी कहता हू।
की जब कोई चीज कही या quote ki jati hai
To uski koi keemat hoti hai
आदिकाल से पुरुष और महिला में लिंग भेद न होकर
सामाजिक फर्क दिखाने के लिए
ताकि पहचाना जा सके। इसलिए ईश्वर ने स्वयं स्त्री को और पुरुष को भिन्न बनाया है।
स्त्री लज्जा है शील है शोभा है वीरांगना है। शेरनी है। पतिव्रता है।
प्रेमिका है।
तो वही पुरुष प्रेम है मर्यादा है आजीविका है। , बलिष्ठ है ,
जब ये दोनों इन सबसे हटकर कही कुछ करेंगे। तो उनिचित उचित का तो सवाल ही नही उठेगा।
😌
आप सब भी अपने विचार रखे
आनंद त्रिपाठी