Hindi Quote in Poem by Sudhir Srivastava

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व्यंग्य -मोक्षदायिनी गंगा
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आज जब हम आप सब भी
गंगा को मां या मैय्या कहते हैं
यह और बात है कि हम सब बहुत स्वार्थी हो गए हैं
मां भी कहते हैं और उसके तन मन को
रोज रोज मैला भी करते हैं।
उसकी पवित्र धारा में डुबकी लगाते हैं
अपने पाप धोकर मोक्ष की अभिलाषा भी रखते हैं,
और उसकी धारा में ही गंदी नाली, सीवर
फैक्ट्रियों का प्रदूषित जल प्रवाहित करते हैं।
कूड़ा करकट, फल, फूल पत्तियों के अवशेष ही नहीं
मानव अवशेष और जाने क्या क्या
विसर्जन के नाम पर समर्पित करते रहते हैं,
बड़े गर्व से मां गंगा को प्रदूषित करने में
यथायोग्य योगदान पूरी तन्मयता से देते हैं।
बड़े बेशर्म हो गये हैं हम सब
मां भी कहते हैं और
मां का आंचल भी दागदार करते हैं,
और तो और सरकारें खुद कानून बनाती हैं
मां गंगा ही नहीं जाने कितनी नदियों नालों, सरोवरों के
साफ सफाई का अभियान भी चलाती हैं,
करोड़ों के बजट का प्रावधान भी करती हैं
और खुद ही गुमराह होती हैं,
कर्तव्य निभाने की औपचारिकता निभाती हैं,
बड़े जोर शोर से अपनी पीठ थपथपाती हैं।
ठीक वैसे ही जैसे हम गंगा को मोक्षदायिनी मानते हैं
और उसका जीवन भरपूर नर्क भी बनाते हैं।
उसके अस्तित्व को मिटाने पर जैसे आमादा हैं,
उसे तिल तिल कर मारने की कमर कसे बैठे हैं।
यह और बात है जिनसे हम आप जन्में हैं
जब उन मां बाप का हम अपमान ही नहीं
भरपूर उपेक्षा भी करते हैं,
अपनी लायकी का बड़ा बड़ा सबूत
सोशल मीडिया पर जब तब उछालते रहते हैं
फिर भला मां गंगा कौन सी बड़ी तोप हैं?
उनसे तो मनमानी करने का लाइसेंस
हम आप स्वयं से तैयार करने का अधिकार
जैसे जन्म के साथ ही पा जाते हैं।
बस जैसे तैसे गंगा को मां ही कहते हैं
क्या यह कोई छोटा काम करते हैं
वो मोझदायिनी है वो अपना काम करती है
और करना भी चाहिए,
नहीं करना चाहती तो न करे
कौन सा हम उसे मजबूर करते हैं?
एक नदी ही तो है वह
फिर भी हम उसे मां कहते हैं
उसे नमन वंदन करते हैं
उसकी पूजा पाठ आरती करते हैं।
अब कोई माने या न माने मेरी बला
पर क्या हम हों या आप
मोक्षदायिनी मां गंगा पर यह एहसान कम करते हैं?
लीजिए आप सबके सामने
मैं अपनी लायकी का सबूत पेश करता हूँ
आप सबकी उपस्थित में एक बार फिर
पतित पावनी, मोक्षदायिनी मां गंगा
हम तुझे शीष झुकाकर नमन वंदन अभिनंदन हैं
बारंबार प्रणाम कर अपनी राह चलते हैं
पहली फुरसत में अगली बार फिर मिलते हैं।

सुधीर श्रीवास्तव
गोण्डा उत्तर प्रदेश

Hindi Poem by Sudhir Srivastava : 111909021
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