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अंगारों का पथ” तूफानों से आँख मिलाकर जो आगे बढ़ जाते हैं, वही समय के पन्नों पर इतिहास लिख जाते हैं। जिसके भीतर ज्वाला हो, उसको कौन दबाएगा, लोहे जैसा अटल इरादा पर्वत भी झुकाएगा। मत डर रण की गर्जन से, मत रुक काँटों की मार से, वीर वही जो लड़ता जाए अपने सत्य-विचार से। रात अगर लम्बी हो तो सूरज भी निकलेगा, मेहनत का हर एक पसीना मोती बन चमकेगा। जो अन्याय के आगे चुप रहकर सिर झुकाते हैं, वे जीते तो दिखते हैं पर भीतर मर जाते हैं। उठ युवक! अपनी शक्ति पहचान, समय पुकार रहा, तेरे साहस का दीपक ही अंधकार हार रहा। धरती तेरे कदमों की आहट सुनना चाहती है, भारत फिर से वीरों की गाथा गाना चाहती है। सिंहासन खुद हिल उठते हैं जब जनता हुंकार करे, सोया हुआ लहू भी फिर अंगारों सा प्रहार करे। मत पूछ समय से कितना और इम्तिहान बाकी है, तेरे भीतर जिंदा अब भी विजय का अभिमान बाकी है। जिसने तपकर दर्द सहा, वही कुंदन कहलाता है, संघर्षों की भट्ठी में ही वीर पुरुष बन पाता है। उठ, अपनी आवाज़ बना तू बिजली की ललकारों को, चीर दे अंधियारे सारे अपने तेज़ विचारों से। कदम बढ़ा तो राह स्वयं मंज़िल तक ले जाएगी, तेरी मेहनत एक दिन दुनिया को झुकवाएगी।
आज जब मैंने 15 अगस्त के मौके पर अपनी कविता सुनाई, तो जिस तरह से आप सभी ने मेरी कविता की तारीफ़ की, उससे दिल बहुत खुश हुआ। मैंने सिर्फ़ कविता सुनाने की कोशिश नहीं की, बल्कि अपने शब्दों के ज़रिए देशभक्ति की भावनाओं को आप तक पहुँचाने की कोशिश की। आप सभी ने मेरी आवाज़, भाव और शब्दों को पसंद किया, इसके लिए दिल से शुक्रिया। सच कहूँ तो आज ऐसा लगा कि मैंने कविता सुनाई नहीं, बल्कि आप सभी को उसे महसूस करा दिया। आप सभी का प्यार और सम्मान मेरे लिए बहुत मायने रखता है।
जिंदगी.,.... कभी धूप है, कभी छाँव है जिंदगी, कभी हँसी है, कभी घाव है जिंदगी। जो कल मिला था, आज दूर हो गया, यही तो बदलता हुआ भाव है जिंदगी। कभी अपने भी पराए हो जाते हैं, कभी अजनबी दिल के करीब आते हैं। जिसे हम समझते हैं अपना हमेशा, वही अक्सर हमें सबक सिखाते हैं। गिरना भी पड़े तो घबराना नहीं, टूट जाओ मगर बिखर जाना नहीं। रास्ते चाहे कितने भी मुश्किल हों, अपने कदमों को पीछे हटाना नहीं। वक्त किसी के लिए रुकता नहीं, दर्द हमेशा दिल में टिकता नहीं। आज अगर आँखों में आँसू हैं तो क्या, हर मौसम हमेशा एक-सा रहता नहीं। बस चलते रहो, चाहे राह कठिन हो, उम्मीद रहे तो मंज़िल भी निश्चित हो। जिंदगी ने जो दिया, उसे स्वीकार करो, और जो नहीं मिला—उसका इंतज़ार करो। क्योंकि जिंदगी नाम ही चलते रहने का है, गिरकर फिर अपने पैरों पर खड़े होने का है। हार मान लेना तो आसान है मगर, असली मज़ा तो जिंदगी से लड़ने का है।
सत्ता के सौदागर” सिंहासन पर बैठे नागों पर, जनता कब तक फूल चढ़ाए? जो रक्षक थे इस धरती के, वे ही घर-घर आग लगाए। वचन बेचते, धर्म बेचते, बेच रहे ईमान वतन का, सोने की थाली में परोसें, विष हर भूखे निर्धन का। माथे पर जनसेवा लिखकर, भीतर काला लोभ छिपाए, हाथ जोड़कर वोट माँगते, फिर जनता को भूल ही जाएँ। खेतों की हरियाली सूखी, महलों में उत्सव की रातें, रोटी रोती चौखट-चौखट, हँसती रहती झूठी बातें। ओ भारत के वीर जवानो! कब तक यूँ अपमान सहोगे? जिनकी नसों में स्वार्थ बहा हो, क्या उनको भगवान कहोगे? यह धरती राणा की धरती, यह चंद्रगुप्तों की जननी, यहाँ नहीं बिकता मानव, यहाँ नहीं झुकती है धरणी। जब-जब सत्ता अंधी होती, जनता बन जाती ज्वाला, एक चिंगारी ही काफी है, जल जाए अन्याय का जाला। उठो युवाओं! हुंकार भरो, अब कलम बने रण का भाला, सत्य-अग्नि से दग्ध करो तुम हर भ्रष्टाचारी का जाला। जिस दिन भूखा किसान उठेगा, टूटेंगे सोने के सिंहासन, जनता जब क्रोधित होती है, डगमग होता हर शासन।
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