आज एक वरिष्ठ पेड़ देखा।तना उसका मोटा था।डालियां झुकी हुई। फूल उस पर आते हैं पर कम। फल भी पहले से कम ठहरते हैं। गर्मी, सर्दी और बर्षा का अनुभव उसे है।सांसें लेता है और सांसें छोड़ता है ,आक्सीजन
के रूप में।उसके बगल में एक छोटा पेड़ उग आया है।दोनों की दोस्ती हो गयी है।वरिष्ठ पेड़ उसे अपने अनुभव बताता है।कि कितनी बार वह कटा है और फिर उगता रहा है और कभी उसने फूल और फल देने नहीं छोड़े हैं।उसकी कोशिश रहती है कि वह छायादार बना रहे। लोग उसकी छाया की प्रशंसा न करें लेकिन वहाँ बैठ कर अपने स्नेह के कथानकों को पिरोते रहें।उसकी एक व्यथा है कि आमतौर पर लोग उसकी तरह पाक-साफ नहीं हैं।पक्षियों उसे अपना बसेरा बनाती हैं।उनका कलरव उसे जीवन्त रखता है।वह टूटना नहीं चाहता है अत:अनेक आन्दोलनों से जुड़ा हुआ है। आदमी से उसका सान्निध्य ज्ञान और प्रेम का है।कालिदास एक पेड़ पर चढ़े मिले थे। भगवान बुद्ध बोधि वृक्ष के नीचे ध्यानस्थ हुये।कदंब के पेड़ों से कृष्ण भगवान का संबंध रहा था।पेड़ साहित्य भी हैं।कविता और गीत उनसे निकलते हैं।जैसे-
"पर्वतों के पेड़ों पर शाम का बसेरा है,
सुरमई उजाला है, चम्पई अंधेरा है...।"
***महेश रौतेला
१७.११.२०१६