जुल्मत की रातों में आदमी की क्या कहानी,
गुमराह तो कर देती है ये तलबगार जवानी ।
सैकत पर बनाता है कोई आरज़ूओ की निशानी ,
पता है लहरे मिटा देंगी लाकर साहिल पर पानी।
लिखता कोई ख्वाबों को अल्फाज़ में बूनकर ,
सुनाता है उनको को फिर गज़लो में मुँजबानी ।
आगाज में लगती है किसको मोहब्बत पुरानी ,
उल्फत का नशा बस कुछ पल का है रूहानी ।
बहुत से उतरे इश्क़ के समंदर में करके मन मानी,
कोई लौट आया इस गर्दिश से किसी ने निभाने की ठानी।
पवन कुमार सैनी