जब दो लोग शरीर से ही नहीं,
अपनी आत्माओं से भी एक दूसरे के क़रीब होते हैं
और किन्हीं कारणों से वो दूर हो जाते हैं
तब उनका दूर जाना
उनकी समझ की,
एक दूसरे के प्रति प्रेम की,
सम्मान की,
मृत्यु दर्शाता है।
मृत्यु अपने संग
असहनीय पीड़ा
लेकर आती है।
मृत्यु से भले ही हम
प्रत्यक्ष रूप से सम्मुख नहीं होते
परंतु पीड़ा हमें निश्चित रूप से
वही अनुभती देती है जैसी किसी
अपने प्रिय जन को सदैव के लिए खोने पर होती है
क्यों?
क्योंकि रिश्ते में बंधे दो व्यक्ति भले ज़िंदा हों
उनके बीच जो प्रेम की डोर थी
जिसने उन्हें जोड़े रक्खा था
वो ना ही सिर्फ टूटी है
बल्कि संपूर्ण रूप से ख़त्म हो गई है।
मृत्यु व्यक्ति की हो,
या रिश्ते की,
या भावनाओं की;
उतनी ही कष्टदायक है।
हमें पूरा अधिकार है
ऐसी मृत्यु पर शोक
व्यक्त करने का
शोकाकुल रहने का
अपनी मनःस्थिति के अनुरूप
व्यवहार करने का।
लेकिन जब हम ऐसा नहीं कर पाते
अपना दुख नहीं बाहर निकाल पाते
तब वह संताप न कर पाने वाली स्थिति
हमारे अंतःकरण में बिना हमें पता चले
पूरी होती है
फलस्वरूप हमें अपने आस पास घट रही
हर परिस्थिति में कमी नज़र आने लगती है।
दरअसल कमी कहीं कुछ नहीं होती
जो रिश्ता हमने खोया है,
उसके ना रहने का एहसास
हमें हर बात, हर दशा में
होना प्रारंभ हो जाता है।
जैसे, किसी मनुष्य के
सांसारिक मोह को छोड़ जाने
के पश्चात हम कितनी विधियों
द्वारा उस व्यक्ति को मोक्ष दिलाने के
प्रयोजन कर उसे अपने अंदर से
भुलाने की कोशिश करते हैं,
ठीक उसी प्रकार हमें
किसी संबंध के टूट जाने पर
स्वयं को समय देना चाहिए
उस संताप से दूर भागने की चेष्टा
नहीं करनी चाहिए।
क्यों, कैसे, किसलिए
ऐसे प्रश्नों को सोच
उस प्रक्रिया को जटिल
नहीं बनाना चाहिए।
अपितु परिस्थिति के अनुरूप
व्यवहार करना चाहिए
अपने अंदर उठ रहे भावनाओं के ज्वारभाटा
को "सब ठीक है" का मुखौटा नहीं
पहनाना चाहिए।
ये प्रकृति का नियम है।
जो चला गया, उसके लिए
शोक मनाना चाहिए,
स्वयं को संतुलित रखने हेतु
यह परम आवश्यक है।
शोकाकुल रहने पर आप
पाएंगे कि विचारों द्वारा
उत्पन्न हो रही
पीड़ा में कमी आने लगी है।
कभी कभी हम अपनी कल्पनाओं
के अधीन हो जाते हैं
और असलियत को स्वीकार
नहीं कर पाते, जिसके कारणवश
हमारा संताप ही हमें नकारात्मकता
की ओर ले जाने लगता है।
"भावनाओं का सृजन
अभिव्यक्त करने हेतु हुआ है।
भावनाएं अभिव्यक्ति मांगती हैं!"
हर रूप में उपजी पीड़ा
अभिव्यक्ति की लालसा रखती है।
उसका सुना जाना अति महत्वपूर्ण
एवम अनिवार्य है।
नकारात्मक चिंतन
चिता के समान है।
इस चिता में जलने से बेहतर
अपने विचारों को सकारात्मक
ऊर्जा के हवन कुंड में
आहुतियों के रूप में विलीन कर देना।
ऐसा केवल अपने आराध्य
के समक्ष संभव है।
अपने विरह की वेदना
अपने ईष्ट के समक्ष रखिए
यक़ीन मानिए,
उनसे ज़्यादा आपको कोई नहीं समझ सकता।
क्योंकि हमने उन्हें नहीं
उन्होंने हमें अपना चुना है,
तभी तो हम उन्हें अपने
ईष्ट के रूप में सोच भी सके!
महादेव🙏