बहुत वक्त के बाद
आज दिल ने कलम उठाई है
खयालों के पन्नों पर
अपने एहसासों को संजोने के लिए।
वो क्या है ना,
अब रोज़ रोज़ लिखा नहीं जाता,
कहने को बाक़ी कुछ रहा नहीं
इसलिए और क्या ही कहूं
ये सोच कर आगे कुछ कहा नहीं जाता।
हां,
जब भी चाय की तलब उठती है ,
तो तुम याद आ जाते हो।
मसालदान से आती इलाइची की खुशबू की तरह
तुम मोहब्बत की महक बन मुझ में समां जाते हो।
कभी जो बेबाकी से अधरों से
लफ्ज़ छलकने लग जाते हैं,
तुम्हारे वो चुप के घोड़े
मुझे सामने खड़े नज़र आ जाते हैं।
यूंही कभी जब कोई गीत की धुन
मन में सवार हो जाती है,
कानों में तुम्हारी आवाज़
न जाने कैसे सुनाई सी दे जाती है।
खिड़की पे खड़े होके
जब भी मैंने चांद को निहारा है।
हर मर्तबा अपनी नजरों को
लाज से झुकते पाया है।
वो क्या है ना,
तुमसे नज़र मिलाने जितनी मोहब्बत
शायद अब भी मुझे तुमसे करना बाक़ी है।
ता उम्र इसी मीठी खुमारी में
रहना मेरा अब भी बाक़ी है।
और वो क्या है ना
तुमसे नज़र मिलाने जितनी मोहब्बत
शायद अब भी मुझे तुमसे करना बाक़ी है।