हर बार चुनना हमें क्यों पड़ता है पहले माता-पिता या ससुराल लड़की को एक किसी परिवार को चुनना है फिर पति देव फरमाते हैं या तो परिवार या मैं हमेशा हमें चुनने का मौका दिया जाता है वैसे और किसी क्षेत्र में दिया जाए या ना दिया जाए परंतु रिश्ते नातों को चुनने का अधिकार औरत को देखकर उसे एक दुविधा में डाल कर खड़ा कर दिया जाता है उसे निर्णय लेना है वह बेचारी क्या निर्णय ले किसकी तरफ से क्या वह अपने माता पिता को छोड़ दे वह अपने सास-ससुर के साथ रहने का शौक पूरा ना करें क्या वह उनके साथ रहकर उनकी सेवा करके उनसे आशीर्वाद प्राप्त ना करें क्या वह अपने बच्चों के साथ रहकर उनकी अठखेलियां के साथ बच्ची ना बन उस वक्त भी पतिदेव चाहते हैं कि उन्हें समय दिया जाए आखिर कब तक यह चुनने का अधिकार हमें देकर इस तरीके से दोराहे पर लाकर खड़ा किया जाएगा परिवार के लोग और हमारा हर चुनाव हर अगले पक्ष को गलत लगता है लड़की माता पिता को चुन नहीं शक्ति क्योंकि उसका विवाह हो गया है वह खुशी से अपने सास ससुर और पति और बच्चों के साथ रह नहीं शक्ति क्योंकि शादी तो पति से हुई अधिकार तो उसके ऊपर पति का है पति है तो बच्चे हैं ऐसा वह कहते हैं हमारा तो मन करता है कि अब हमारे आसपास रहे हमारे साथ रहे सर देखिए दुर्भाग्य सुनना तो पड़ेगा ही