जिंदगी भर अनुकरण करना कितना आसान
जो पीढ़ियों ने किया वही है करना
ठहरो ! लेकिन क्या होगा गर मुझे न भाए ?
न भाए मुझे अगर वह व्यापार
न करू में क्रोधित पुरुष सा व्यवहार
न करू में ब्याह कच्ची उम्र में
न चीखू में घरकी महिलाओं पे
न आदत मुझे मदिरा की
न पसंद मुझे जूठे रिवाजों की गैर मान्यता मे
हा ! में पूर्णरूप से पुरुष हूं
जो जाने रसोई के सारे काम
न खलती मुझे बीवी की कमाई
न जमाना मुझे रौफ, जिससे साबित हो मर्दानगी
न बेबस में इतना की न कह सकूं दिल की बात
न कायर इतना की करू अनचाहे वार
क्यों समाज एक शूरवीर को भावनाओ से विरुद्ध मानता
जो आखों से बहा सके अश्रु वह पोंछ भी सके हजारों दर्द
जो बुद्धिनिष्ठ है वह बिल्कुल सभ्य हो सकता हैं
कमजोर पुरुष तो कभी न था
बस समाज के कुछ तत्व अस्पष्ट फिर फिजूल बैठे
यूं ही बनाए अमुक नियम जो तबाह कर रहा
हर एक की जिंदगी 🍂
उर्मि