हालातों ने मजबूर भी कितना कियाl
एक मरती फूटती जिंदगी को रोका मरने से
बेहद दर्दनाक वो हादसा था
जब उसने अनसुना किया उसकी चीख को थप्पड़ से
झूलम्म भी कैसे कबूलता कोई
जब खुद ही धोखा खा गए शख्स पहचानने से
कोई कीमत आके तो कभी गुलाम बनाए
मौत भी तो ना जाने गुम है कई दिनों से
ऐसे जीने से तो हररोज आत्मा की मृत्यु हुई
हर कोशिशें नाकामियाब गुंजाइश भी क्या खुदा से
कही न कही जरूर कोई संकेत था
जो बचा रहा था रब मुझे
मुझे लड़ना था, हा! हूं तैयार कलेजे में बारूद लिए
अब सामना करना है आत्मविश्वास और दृढ़ता से
उर्मि