आज रिश्तेदार के बेटे की सगाई में गये थे। पूरी सगाई में पंडित जी को कहीं नहीं देखा। सब लड़के और लड़किया ही पंडित जी का काम कर रहे थे। आज कल तो लोग (गुड़ और धी) से मुह मिठा करना तो जैसे भूल ही गये है। क्योंकि केक का जमाना आ गया है। रिंग पहनाई, केक काटा एक दूसरे को खिला दिया। लो हो गई सगाई...... कोई ये बात समझे या नहीं। पर बड़े लोग कहते है... वक़्त से साथ चलना जरूरी है मगर अपनी परंपरा और रीति - रिवाजों को भूलना नहीं चाहिये।
प्रसंगो मे रीति - रिवाजों बड़ा मूल्य है जो आज की नयी पेढ़ी के लोग नहीं समझते है या समझना चाहते नहीं है।
_Miss Chhotti