पढ़ने बैठ तो सही
पढ़ाई के बोझ ने,
बच्चो को दबा दिया।
हंसते खेलते इंसान को,
दबा हुआ बना दिया ।।
लेकिन, तू कोशिश कर तो सही,
उठकर पढ़ने बैठ तो सही।
क्यो नहीं समझते?
यह बात घरवाले, कि
लड़ रहे हैं हम भी दिन-रात
अपनी ही चिंता से ।
चिंता में मग्न ये आँखे
रोज़ रात को जागेंगी,
बचे हुए स्लैबस के बारे में,
बस सोचती रह जाएँगी।
कर तो सकते हैं बहुत कुछ
पर हिम्मत कहाँ से लाए ?
बोर्ड्स के इंतज़ार में
कट रही इस जिंदगी के लिए
एक आशा कहाँ से लाए?
पढूने बैठेंगे हम भी, ऐसे
कि
किताबें, कुर्सी, मेज़ दोस्त बन जाएंगे,
क्योंकि बाँकि दोस्त तो,
तब तक बिछड़ जाएँगे।
उम्मीद आसमान चूमेगी,
आँखे सपनों से जगमगाएंगी।
ये दिन दूर न नहीं,
बस आज ही हैं तू कोशिश कर तो सहीं!
उठकर पढ़ने बैठ तो सहीं !!!
लेखिका - मनस्वी पूरी