आंखे झिलमिलाई
धूल बार बात साफ की
देखकर दंग रही
ये चेहरा जाना पहचाना सा
बेशक अजनबी नही
क्यूं याद नहीं आ रहा
पता उसका
पोशाक उसका
चाल ढाल है बदले
कल ही तो आए स्वप्न में
अर्सो बाद यूं अचानक !
अकेले हो या ना हो
बस दूर से मुस्काना
फूल पन्नो में अब रहे नही
खत धूल से भरे पड़े
जिक्र कभी होता नहीं
और फिक्र मैने छोड़ दी है
हा अगर बात है यादों की
तो वह धीरे धीरे
मिट जाती हैं
समय के साथ वक्त पर!
उर्मि