प्रतंत्रता की स्वतन्त्रता!
जब हम अस्तित्व की ही कल्पना हैं
फिर क्यों न उसे ही सपने
गुनने, बुनने, देखने
और जीन दे?
मिल कर भी न मिलने वाली
अपनी स्वतंत्रता
और स्वतन्त्रता की प्रतंत्रता
से होती अनवरत खींचा तानी!
इस उधेड़ बुन मे पल पल
खोती जिंदगी
कुर्बान होती उस पल पर
जो अभी नहीं हैं
क्योंकि वह कही नहीं है।
क्यों न बांसुरी ही बन जाएँ!
बजाने वाला बन कर देख लिया
बिना पतवार की नाव भी बना
लहरे देखी और तरंगो मे
उतराया और डूबा भी!
क्यों न बांसुरी ही बन जाएँ
सागर ही हो जाएँ
छोड़ दें अपने आप को!
उस अस्तित्व के हवाले ।