अजब है ये जहां भी।
जहां भी मैं खड़ा होता हूं।
लोग आ जाते है अपने तुम्हारे लेकर वहां भी।
अजब है ये जहां भी।
पैदा हो गए लेकिन चलना 6 साल बाद ही है।
पैदा होते ही रोना धोना राज का राज ही है।
तकलीफ दवा दारू
रोटी बॉडी थोड़ी मोटी,दूल्हा उसका काला
कहां है मेरा घरवाला।
हा वो नही रहे।
कब गुजर गए।
कितना शर्मीला है।
जल्दी खाले अभी लचीला है।
जीवन खाली कटोरा है।
जीने वाला चटोरा है।
बगल में एक मधुशाला है।
रोज शाम वहा एक मेला लगता है।
रात भर लोग खरीदते है पीते हैं खाते हैं। एक दूसरे से गम बाटते और भूल जाते हैं।
वहां सब मिलता है।
शायर , कायर , गोरा काला
और जिसका खोया था न , उसका घर वाला।
न कोई नियम न कानून न कायदे
और फायदे बस फायदे ही फायदे।
हालांकि डॉक्टर बहुत सतर्क रहने को कहते हैं।
लेकिन जो खोए हैं वो यहां कहां रहते हैं।
बहुत कुछ है इस जहां में। , बहुत कुछ है भी नहीं।
एक नशा हो ख्वाब फिर मैं भी नहीं तू भी नही।
है न सही कितना सही
एक नशा करके
आंखो को अब लाल कर दू ख्वाब भर करके।
फिर कहां ही वक्त होगा मैकद्दो का।
फिर न कोई ये कहेगा सरफिरो सा।
आनन्द त्रिपाठी