किताबें
कुछ महंगी सी वो किताबें थी ।
उसे फिर खरीदने की नही मेरी औकात थी।।
पढ़ना मेरा शौक था।
पर मेरी गरीबी भी मेरे साथ थी।।
ना हार माना खुद से।
अभी तो मंजिले मुझ से बहुत दूर थी।।
किताबें बहुत सबक सिखा रही थी।
पर उसे फिर खरीदने की बस बात थी।।
लेकिन पीछे मेरी गरीबी मेरे साथ थी।
फिर सोचा खुद से पास
एक बस मेरे सस्ती सी कलम थी।।
अब किताबों का सबक सिखा जिदंगी रही थी।।
अब फिर हमारे ही हाथो कलम वो चला रही थी।
जो किताबें महंगी कभी थी।।
आज फिर उनकी औकात हमारे हाथो मे थी।
जो किताबें हमसे बहुत दूर थी।।
आज फिर वही खुद से हमे लिखा रही थी।
अब हमे किताबों की नही।।
बस एक कलम की जरूरत थी।
उस वक्त मेरी पसंद की किताबें महंगी थी।।
दिनेश दिवाकर✍️