लगा हुआ है
शीर्ष गगन पर,
बना हुआ है
छटा बिखर कर।
उगा हुआ है
वृक्ष वहाँ पर,
देख रहा है
छाँव वहाँ कर।
बचपन का तन
मांझ रहा मन,
खेल लिया जो
है उसका दिन।
लगा सूरज ने खेली होली
सुबह कितनी लाल हुयी,
सुनहरे गगन के अंगों से
आज कितनी बात हुयी!
खुल गये बदन
रंगों के संग,
हवा में फाग
हम हो गये बदरंग।
धरा पर बोली होली
मिटता नहीं रंग,
नर और नारायण दोनों
रहते होली में संग।
* महेश रौतेला