खुद के घर मे खुद को पराया पाना ऐसी ज़िन्दगी को बुज़ुर्ग की ज़िंदगी कहते है। अपनो के बीच खुदको अकेला कर देता है ये वयोवृद्ध। कहने के लिए तो सब हमारे पास होते है बस साथ कोई नही होता । अगर कल स्वास्थ्य को कुछ हुआ तो एक कतार सी लगती है ये देखने के लिए, दर्द को बांटने ने के लिए लेकिन कोई हमदर्द नही होता। जो दर्द से वो गुज़र रहे है क्या उसका कोई दूसरा विकल्प हो सकता है? दादीमाँ सबके पास से अपना समय माँग रही है और सब समय निकाल के उनके हालचाल पूछने आ रहे है। तभी तो वयोवृद्ध बचपन से अलग होता है, बचपन आपकी हर ख़्वाहिश को पूरा करता है और वयोवृद्ध हर ख्वाहिशो पर मिट्टी डालने की कोशिश करता है। सबसे जरूरी बचपन आपको हर एक अपनो का समय देता है चाहे उसके पास तभी हो भी नही।
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"Unkahe रिश्ते - 2" by Vivek Patel read free on Matrubharti
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