"एक लाचार पिता "
वो खुद में इतना मस्त हुए, कि हमको भूला दिया
हम आँख में भर जिन्हें ख्वाब लखे, हमको ही जुदा किया।।।
छोटे छोटे पइयां पे, हम खुश हो जाते थे
चलते बकइयां पे, हम हौले मुसकाते थे
कभी गर छींक भी दे, तो तड़प ही जाते थे
बिस्तर गीला करके, सारी रात जगाते थे
अब हमसे गिला क्या है, जो खुद से दूर किया।।। १
फटे हुए जूते में, हम खुद रह जाते थे
चिथड़े सिल सिल के हम, खुद पे सधाते थे
टूटे हुए चश्मे को, हम खुद तो पहनते थे
ऐसे में सदा उनको, इज्जत से रखते थे
अब हमसे गिला क्या है, जो खुद से दूर किया।।। २
सुबह ठंड में भी, जल्दी उठ जाते थे
स्कूल छोड़ने को, तुमको ले जाते थे
ट्यूशन भी पढ़ाते थे, पुस्तक भी दिलाते थे
तुम खूब पढ़ो ऐसा, माहौल बनाते थे
अब हमसे गिला क्या है, जो खुद से दूर किया।।। ३
यदि नंबर कम आए, मायूस भी होते थे
जिंदादिल बनकर के, फिर से लग जाते थे
ख्वाबों की दुनिया में, खुद को ले जाते थे
तुमको कोई साहब, सरकार समझते थे
अब हमसे गिला क्या है, जो खुद से दूर किया।।। ४
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