सुनी पड़ी है वो गलियां जो कभी हमारी हसीं से गुलजार थी l...
वो मैदान भी आज छूट गया जिसमे यादें अपार थी...
वो मिट्टी की खुशबु भी गायब है कहीं, कहीं वो बल्ला भी हमारा छूट गया...
आज जब सोया यादों की नींद में मैं , मैंने बचपन के उन सपनों में खुद को खो दिया ....
हस्तां हुआ सा चेहरा था उन दिनों हमारा ,आज जब याद किया तो मुसाफिर हस्ते हस्ते रो दिया......