ये आदमी
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सारी जि़न्दगी बोझ सांसों का लेकर ढोता है आदमी,
जब सांसे छोड़ देत़ी है साथ, बिना बोझ तैरता है आदमी।
दोस्ती कभी कोई विशेष जज़बा नहीं होती है,
जिससे भी हो जाती है, वही खा़स बन जाता है आदमी।
सूरज की हस्ती, जंहा डूबता है, वहीं से फिर निकलता है,
मौत के आगोश में डूबकर फिर कभी नहीं निकलता है आदमी।
कोई जरूरी नहीं है कुछ तोड़ने के लिये पत्थर ही हो,
एक लफ्ज़ में ही सदा को दिल तोड़ देता है आदमी।
कितनी ही बार सोचा है कि ना याद करूं तुझको,
बेबसी का गुलाम क्यों बन जाता है ये आदमी।
आसमां छूने की कोशिश में ज़मीन पर पैर कभी न टिके,
इस तरह की जि़द में कहीं का भी नहीं रहता है आदमी।
जि़न्दगी और मौत जब दोनों एक हो जाते हैं,
वह मरा या जिया, किसको क्या बताये ये आदमी?
-शरोवन