राजनीति के सताएँ हुए हैं, नेताओं के मारे हुए हैं,
हमने दिया है घर का चिराग , तब उजाले हुए हैं।
तुमने जीती हुई जमीन भी लौटा दी बे- झिजक,
इस जमीन के लिए कुर्बान कितने दुलारे हुए हैं ।
जो कमजोर यह सियासत ना होती,
तो आज सरहद इतनी भारी ना होती ।
हमने तुम पर तब भरोसा किया था ,
वरना इतने जवान की कुर्बान ना होती।
अपनी जान देकर भी हम वहाँ लड़ गए,
तब जा के इस तेरे देश मे चुनाव हुए हैं ।
राजनीति के सताएँ हुए हैं, नेताओं के मारे हुए हैं,
हमने दिया है घर का चिराग , तब उजाले हुए हैं।
दर्द देकर हम चले गये हैं,
शांति नाम पर मारे गये हैं।
सांसद मे हुआ हुमला तब,
वहाँ हमको बुलाये गये हैं।
देश ने जिसको गद्दार समझा ,
आज वो ख़ुरसी पर बैठे हुए हैं।
राजनीति के सताएँ हुए हैं, नेताओं के मारे हुए हैं,
हमने दिया है घर का चिराग , तब उजाले हुए हैं।
मे जिसके लिए विदा हो गया हूँ,
मे सियासत मे उछाला गया हूँ।
जो खून मैनें जिसके लिए दिया था,
आज मे संसद से निकाला गया हूँ।
भूखे सोते है मेरे छोटों से बच्चे,
आज दूर उनसे निवाले हुए हैं।
राजनीति के सताएँ हुए हैं, नेताओं के मारे हुए हैं,
हमने दिया है घर का चिराग , तब उजाले हुए हैं।
मुआवजे से हमे तौलने लगें हो,
शहीद का मूल्य बोलने लगें हो।
सैनिक के बलिदान को तुम सब,
गंदी सियासत से जोड़ने लगें हो।
आपको बन गए बड़े बड़े बंगले,
हमारे घर भी अब किराये हुए हैं ।
राजनीति के सताएँ हुए हैं, नेताओं के मारे हुए हैं,
हमने दिया है घर का चिराग , तब उजाले हुए हैं।
कवि मनोज्ञ संतोकी (मोरबी)