जायात्मजार्थपषुभृत्यगृहाप्तवर्गान्
पुष्णाति यत्प्रियचिकीर्षुतया वितत्वन्।
स्वान्ते सकृच्छ्रमवरुद्धधनः स देहः
सृष्ट्वास्य बीजमवसीदति वृक्षधर्मा।।
अर्थात् – जीव जिस शरीर का प्रिय करने के ही लिये अनेक प्रकार की इच्छाएँ व कर्म करता है तथा स्त्री-पुत्र, धन-सम्पत्ति, गज-अश्व, सेवक, घर-द्वार व बन्धु-बान्धवों को विस्तारित करते हुए उनके पालन-पोषण में लगा रहता है, बड़ी-बड़ी कठिनताओं को सहकर धन संचय करता है, आयु पूर्ति होने पर वही शरीर स्वयं तो नष्ट होता ही है व वृक्ष के समान दूसरे शरीर के लिये बीज बोकर उसके लिये भी दुःख की व्यवस्था कर जाता है।