शिष्य शंका करता है कि यदि आत्मा निरंजन है तो दुःख का संबंध किस प्रकार होता है, तिस का गुरु समाधान करते हैं कि, सुखदुःख भ्रांतिमात्र है, वास्तविक नहीं, निरंजन आत्मा के विषें द्वैतमात्र से सुखदुःख भासता है वास्तव में आत्मा के विषें सुखदुःख कुछ भी नहीं होता है तहां शिष्य प्रश्न करता हे कि, हे गुरो! द्वैतभ्रम को औषधि कहिये जिस के सेवन करने से द्वैतभ्रम की निवृत्ति होती है ! तिस का गुरु उत्तर देते हैं कि, हे शिष्य ! मैं आत्मा हूं, अमल हूं, माया और माया का कार्य जो जगत् तिस से रहित चिन्मात्र अद्वितीयरूप हूं और दृश्यमान यह संपूर्ण संसार जड और मिथ्या है, सत्य नहीं है, ऐसा ज्ञान होने से द्वैतभ्रम नष्ट हो जाता है, इस के बिना दूसरी द्वैत भ्रम से उत्पन्न हुए दुःख के दूर करने की अन्य औषधि नहीं है ॥१६॥
बोधमात्रोऽहमज्ञानाडुपाधिः कल्पितोमया।
एवंविमृशतोनित्यनिर्विकल्पेस्थितिर्मम ॥
शिष्य प्रश्न करता है कि, आत्मा के विषें द्वैतप्रपंच का अध्यास किस प्रकार हुआ है और वह कल्पित है या वास्तविक हे तिस का गुरु समाधान करते हैं कि,
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सोऽभिजिज्ञासत किं मे कुलं किं मे
कृत्यमिति । तं ह वागदृश्यमानाभ्युवाच भोभो प्रजापते
त्वमव्यक्तादुत्पन्नोऽसि व्यक्तं ते कृत्यमिति । किमव्यक्तं
यस्मादहमासिषम् । किं तद्व्यक्तं यन्मे कृत्यमिति ।
साब्रवीदविज्ञेयं हि तत्सौम्य तेजः । यदविज्ञेयं तदव्यक्तम् ।
तच्चेज्जिज्ञाससि मावगच्छेति । स होवाच कैषा त्वं
ब्रह्मवाग्यदसि शंसात्मानमिति । सा त्वब्रवीत्तपसा मां
विजिज्ञासस्वेति । स ह सहस्रं समा ब्रह्मचर्यमध्युवासाध्युवास ॥