हार से क्यों डरे हम?
मनको आशा से क्यों ना भरे हम?
जब मेहनतसे ही मीलती है सफलता
तो बार बार कोशिश क्यों ना करे हम?
मन मे विश्वास क्यों ना धरे हम?
प्रयत्न करने से पहेले ही अंजामसे कयों डरे हम?
खुलकर जीने से पहेले
यू ही हर रोज कयों मरे हम?
मनको निराशा से क्यों भरे हम?
मनको आशा से कयों ना भरे हम?
जब मन हमारा साफ है तो
जमाने के सच्चे झुठे तानो से क्यों डरे हम?
गर खुदपे यकीन हो अतुट तो
मंझील पाने से पहेले क्यो रूके हम?