“शहर में मजदूर के जैसा, कोई दर-बदर नहीं।
जिसने सबके घर बनाएं, उसका खुद का कोई घर नहीं।। अगर कोई अपना हो तो, हो आईने जैसा।
जो हंसे भी, रोए भी, हमारे साथ...
मेरे पास मौसम की कोई जानकारी नहीं।
पर इतना जानता हूँ, यादें हमेशा तूफान ही लाती हैं।।
बर्तन खाली हो तो, ये मत समझना...
कि मांगने चला है, क्या पता...
सब कुछ बाँटकर ही आया हो।
बेहतर दिनों की आस में जीते हुए,
हम अपने बेहतरीन दिन भी गवाँ बैठे।।
इश्क अधूरा रह जाए तो, खुद पर नाज करना।
क्योंकि सच्ची मोहब्बत कभी मुकम्मल नहीं होते।।” © जतिन त्यागी