“कई रात गुजारी है इस अंधेरे में,
तुम थोड़ा सा नूर ले आओगे।
मेरे तकिए गिले हैं आंसुओं से,
क्या तुम मुझे अपनी गोद में सुलाओगे।।
सुना है बाग है तुम्हारे आंगन में,
मेरे ला हासिल बचपन को वह झूला दिखाओगे।
मैंने खोया है अपनी हर प्यारी चीज को,
मैं अपनी किस्मत फिर से आजमाउंगा।।
एक शायरी लिखी है,
कभी मिलोगी तो जरूर सुनाऊंगा।” © जतिन त्यागी