ज़माने को शिकायत थी हमसे कभी
फिर आज क्यों इस जंहा को हमसे मुगालता नहीं
जिनको पलकों मे सम्भाल के रखा था कभी
फिर आज क्यों वोह हमे सम्भालता नहीं
ऐसे हमने असबाब बनाये थे उसके लिए
फिर आज क्यों वोह हमे इस हालत से निकलता नहीं
बर्बाद होगये है किसी के इश्क मे इतना की
अब कोई हमारी इज्ज़त सरे-बाज़ार उछालता नहीं
-Mukesh