मस्त हैं हम!!
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दिखाई देते हैं यहाँ प्रति दिन,
पसीने की गंध से
सराबोर रहते हैं वे..
सिंह द्वार परआते हैं,
फ्रिज का पानी माँगते हैं,
न हो,तो मुँह बनाते हैं....
रखना शुरू कर दिया
उनके लिए पानी
कभी ठंडी छाछ
अगर बच जाए तो
सब्ज़ी, दाल भी
कुछ न हो तो कभी
माँग लेते हैंअचार !...
सामने वाले घने पेड़ की छाँह मेंबैठ,
मुक्के से दो टुकड़े प्याज़ को
बाँटखाते हैं प्यार से....
पेट पर धर हाथ लेते हैं लंबी डकार
धूल झाड़ अपने सिर के साफ़े से
बिछा ज़मीन परआड़े
लेट जाते हैं घड़ी भर...
इनके चेहरों पर नहीं दिखी मुझे
कभी वो शरारत, वो मस्ती
वो आँखों ही आँखों में होने वाले इशारे
जो बरसों पूर्व झाबुआ के बाज़ार में....
दिखे थे मस्ती भरे नज़ारे
रुनझुन करती गिलट की पायलों से
छनकते सुर सुने थे
भेंट हुई थी उनसे...
पुरुष-स्त्री दोनों ही तो थे...
एल्युमिनियम का टिफ़िन लटकाती स्त्री
झूल रहा था जिसके वक्षस्थल पर
कई लड़ियों वाला रंग-बिरंगे
पत्थरों से जड़ा
गिलट का हार...
हाथों में गिलट की चूडियाँ,
कानों में झूलती लंबी लटकन...
मर्द के कंधे पर सवार,
सिर पर बजाता तबला
नन्हे हाथों से...
दूसरे कंधे पर गमछा
एक हाथ में लटकता ट्रांजिस्टर...
धुन बजाता'आजा,सनम मधुर चाँदनी में हम'
खिलखिलाते चेहरों पर
तपती धूप में बरस रही थी
गीत की चाँदनी
छलक रही थी आँखों में...
बरसों पहले जैसे छूआ ,
उस तपतीचाँदनी को
जो स्मृति बन,
समाई है
शब्दों में उतर आई है...
कनबतियाँ करती है
कहती है,जीवन हम भी जी रहे
अपेक्षा नहीं किसी बड़े पल की
हम मुहब्बत में जीते हो
तुम अहं,ईर्ष्या में....
डॉ प्रणव भारती