मित्रों
बेहतर है खुद को समझाना
यदि कोई और नहीं समझे ,
जीवन का ये ताना-बाना
यदि और कोई न खोले तो
खुद आगे बढ़कर खोलो
संतापों को जाने भी दो ,
हर मौसम अपने सिर ले लो
किस-किस करो शिकायत तुम
किस किससे पीड़ा लोगे अब
यह रीत जगत की है मितरा
रोते के पास नहीं कोई
गर मुसकानें झूठी भी हों
सब मौसम ज़िंदा रहते हैं
अपने दिल की दुनिया में फिर
मौसम मुस्काते रहते हैं
बंधन खोलो फिर तुम बोलो
सबसे ही स्नेह करो मितरा
सबकी आँखों में हों खुशियाँ
न हो आँसू का एक कतरा -----
शुभ रात्रि मित्रों
डॉ प्रणव भारती
कुछ साज सजाने आएंगे
गर मुसकने झूठी भी हों
सब रास ही रास रचाएंगे
हम खुद के आँसु पी लेंगे