माँग रही हूँ क्षमा मै तुमसे अबतक जो,
अपराध किया |
कसकर पकड़ा था मैने चाहा तुमने आजाद किया |
छोड़ो शब्दो मे मुझे समझना ,
शब्दों मे न ढल पाई हूँ,
जितना समझा उतने मे ही तुमने है आरोप दिया |
अब तक रहा है व्यर्थ मेरा , संदेश भेजना शब्दों में |
अन्तिम पंक्ति यह फिर लिखती हूँ |
समझ अगर यह पाओ तो ,
जीवन , मृत्यु के बीच फर्क मुझे जरा बतलाओ तो ?
अधिक लिखूँगी तुम पढ़ लोगे पढ़ने लिखने मे अन्तर है,
समझ चुकी हूँ , भाव समझना , कितना कितनो को मुश्किल है, मगर निराशा तब आई जब अपना ही मन भेद करे , समझ बिठाकर खुद से ही खुद अपने से खेद करे | समय मिले तो फिर से पढ़ना पिछले मेरे हर शब्दों को , फिर पढ़ना तुम अपने मन को जो शब्दों मे ढाला है |
20/4/2022