कल घड़ी वो जिसकी ,
प्रतीक्षा नही थी आने की जीवन के साथ ,
नही गुजरा एक दिन जब यह आँखे बरसी न हो ,
आज अजीब सा है कुछ न शान्त हूँ न अशान्त,
न पीड़ा है न विचलन मगर हो रही है शरीर मे न
जाने कैसी धीमी कंपन ,
चल रही हूँ मगर !
न जाने कैसी देहिक
निष्क्रियता का आभाष है |