हर जगह , हर शक्श मे ,
हर बात मे चलते फिरते -फिरते बस,
तू ही नजर आता है लेकिन ,
मुझे तुझमे, तेरा वही रूप भाता है ||
इतंजार कितना बताती नहीं हूँ ,
है प्रेम अब जताती नही हूँ ||
विकल्प चुन तो लू भी ,
यह मेरे हाथ मे कहाँ ,
तेरे बाद , एक मौत का किनारा ही नजर आता है ,
नही भाती यह दुनिया ये दुनियादारी ,
बस निभती जा रही है जिम्मेदारी ||
हृदय की पीर शायद ही क्षणभर ठहरती हो ,
भूल जाती हूँ वह रास्ता जहाँ से वह गुजरती है ||
हाथ उठते है सजदे मे मगर कुछ माँग नही पाती ,
माँगी थी तुमने ही बरबादी उसी की याद आ जाती||
लिखी साँसे लकीरे पूरी करती ,
एक लबेदे मे अनचाहा प्राण भरती ||
हर बार कोशिश यही कि निकल आऊँ ,
हृदय, मनगति शून्यकर शव सा जीवन बिताऊँ ||
कुछ क्षण मे ही कोई जगा जाता है, हृदय को अनगिनत अभिलाषाओं से भर जाता है||
रुप अलग -अलग किन्तु टिकी एक बिन्दू पर ,
जो नितप्रति आकार बढाता है| |
प्रतीक्षा 16/4/2022