बहुत बहलाया है शब्दो से,
समाझाया , प्रेम जताया ,
कभी जाहिर की नाराजगी ,
न जाने दिन मे कितने रूप बनाकर ,
शब्दों की खिचड़ी पकाकर आते हो मेरे सामने ,
कभी आँखे तो कभी पीड़ा से भर देते हो ,कभी स्नेह की बारिश कर मन हरिहर कर देते हो , कभी आसक्ति तो कभी विरक्ति की तान छेड़ जाते हो ,
हर जगह उपस्थिति जताते हो , मै जहाँ जाऊँ पीछे- पीछे आते हो | कभी आगे आकर मेरी नादानिया ,
मेरी गल्तियाँ सम्भाल लेते हो | न कभी दिखते हो , न दिखाते हो फिर भी मुझपर असीमित प्रेम लुटाते हो | तुम्हारी कलाओं से परिचित होने लगी हूँ , धीरे धीरे तुममे ही खोने लगी हूँ , नही भाता संसार यह या फिर तुम्हारा अदृश्य रहना , थोड़े मे गुजारा नही है अब ,मै ज्यादा चाहती हूँ , तुम्हे देखना , तुम्हे स्पर्श करना ,
तुमसे बाते करना , तुम्हे सुनना | बस तुम्हारी ही आवज इन कानो की प्रतीक्षा है , तुम्हारे दर्शन नैनो की प्रतीक्षा है,
तुम्हारा स्पर्श मेरे अन्तरमन रोम - रोम की प्रतीक्षा है |07/4/२०२२